पं. श्रीराधेलाल जी चौबे की यात्रा
श्री न र व र आश्रम सेवा समिति मन्दिर श्री खोले के हनुमान् जी के संस्थापक त्यागमूर्ति तपोनिष्ठ, परम श्रद्धेय श्री राधेलाल जी चौबे का जन्म जयपुर में कार्तिक शुक्ल द्वादशी (व्यञ्जन द्वादशी) सम्वत् 1986 तद्नुसार दिनांक 14 नवम्बर 1929 को हुआ।
9 अगस्त 1961 को हनुमान भक्त श्री राधे लाल जी चौबे अपनी मित्र मंडली के साथ ठंडाई छानने की गरज से लक्ष्मण डूंगरी आये |
इस प्यारनुमा घाटी में उनको हनुमान जी की संजीवनी हाथ में लिए छवि का एहसास हुआ, तभी वहां बैठे एक चरवाहे ने बताया कि यहां पर हनुमान जी हैं, उसके बाद चौबे जी और मित्र मंडली ने झाड़ झनकार हटाया तो धूल धुसरित चट्टान में सिन्दूर लगी हनुमान जी की मूर्ति के दर्शन हुए|
'पर्वत पाहन पापड़ा, नर वानर आकार। प्रकटा बीहड़ खोल में, हनुमत तन साकार'
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संयोग वश उस दिन तुलसी दास जी की जयंती भी थी मित्र मंडली के साथ मिलकर चौबे जी ने तुलसी जल एवं चोला भी चढ़ाया |
उस दिन के बाद चौबे जी गृहस्थी छोड़ राम भक्त हनुमान जी की सेवा में लग गए | उसके बाद चौबे जी एवं उनकी मित्र मंडली ने एक छप्पर और कच्चे रास्ते का निर्माण किया |
उसके बाद दानदाताओं एवं मित्रो से संयोग प्राप्त कर निर्माण कार्य प्रारम्भ हुआ | पानी की टंकी वाली पहाड़ी से लोगों का आह्वान कर आश्रम तक लाना, वहाँ रसोई बनाने के लिए सामान बर्तन, छाने एवं पानी
व अन्य सुविधा उपलब्ध कराना, उनकी पर्याप्त सेवा करना आदि से दस-बीस लोगों को जोड़ना शुरू किया।
प्रारम्भ में मन्दिर में एक रजिस्टर रहता था, जिसमें आने वाले भक्तजन अपना नाम-पता इन्द्राज करते थे। इससे पता चलता था कि किसी दिन 10, किसी दिन 15, मंगलवार के दिन 100-150 भक्तजन दर्शन लाभ उठाते थे |
बाबा की पूजा होने लगी। कुछ दिनों बाद पास में ही एक मुस्लिम फकीर भी आकर रहने लगा। शुरूआत में तो यहाँ पर आने वालों पर नाराज होता लेकिन बाद में वह किसी के भी आने पर प्रसन्नता जताता। आज भी वहां अन्नकूट महोत्सव के दिन गाजे बाजो के साथ मंदिर की तरफ से अन्नकूट का भोग एवं
चादर भेंट की जाती है|
देशी खेलों के प्रति समर्पित रहे श्री राधेलाल चौबे जी के सान्निध्य में वर्ष 2009 में अन्तर्राज्यीय स्तर की कबड्डी स्पर्धा का मन्दिर परिसर में आयोजन कराया। चौबेजी प्राणपण से आयोजन को सफल बनाने में जुटे। इस आयोजन के समापन के पश्चात् वे बीमार हो गए और 5 जनवरी 2010 को श्री खोले के हनुमान जी की शरण में ही ब्रह्मलीन हो गए।
मंदिर के स्थापना से गत 60 सालों में मंदिर का जो भी विकास किया गया है उसके लिए चौबे जी महाराज अविस्मरणीय रहेंगे और आज भी उनकी कृपा प्रसाद (आशीर्वाद) से मंदिर का विकास हो रहा है|